असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः। नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति॥49॥
Translation (HI)
जिसकी बुद्धि आसक्तिहीन, आत्मसंयमी और इच्छा रहित है — वह संन्यास के द्वारा कर्महीनता की परम सिद्धि प्राप्त करता है।
Life Lesson (HI)
निष्काम भाव और आत्मसंयम ही पूर्णता की राह है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो व्यक्ति आसक्तिहीन बुद्धि वाला है, आत्मसंयमी है और इच्छा रहित है, वह शुद्ध संयास के माध्यम से कर्महीनता की परम सिद्धि को प्राप्त करता है। इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति अपने कर्मों में आसक्ति के साथ नहीं लिप्त है, उसका मन आत्मा के अन्यान्य विषयों में नहीं भटकता है और वह कर्मों के फल की इच्छा में नहीं उलझा है। ऐसे व्यक्ति कर्महीनता की सबसे ऊँची सिद्धि को प्राप्त कर लेता है।
इस भावार्थ के माध्यम से हमें यह समझ मिलता है कि निष्काम भाव और आत्मसंयम ही एक साधक के लिए जीवन की पूर्णता की दिशा में मार्गदर्शन करते हैं। यह हमें यह शिक्षा देता है कि कर्मों को भावनाहीनता से अनुत्तरित करना है और अपने मन को आत्मा की ओर उन्मुख करना है। इस प्रकार, यह श्लोक हमें एक साधक के जीवन में आवश्यक गुणों के विकास के मार्ग की दिशा में मार्गदर्शन करता है।