आत्मा न कटने योग्य है, न जलने योग्य, न भीगने योग्य और न सुखाने योग्य। यह नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर और सनातन है।
Life Lesson (HI)
सच्चिदानंद स्वरूप आत्मा सर्वत्र व्याप्त और अविचलित है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण आत्मा की अविनाशिता और अविचलितता का महत्व बता रहे हैं। आत्मा का कहना है कि वह न तो काटा जा सकता है, न जला जा सकता है, न भीगा जा सकता है और न ही सुखाया जा सकता है। यह नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर और सनातन है।
यह श्लोक हमें आत्मा की अमरता, अविचलितता, और अविनाशिता के बारे में शिक्षा देता है। यह आत्मा कभी नष्ट नहीं होती और सदैव अस्तित्व में रहती है। यह सच्चिदानंद स्वरूप है और सर्वत्र व्याप्त है, जिससे हमें अपने आत्मा के अमर स्वरूप की अवगति होती है। इस श्लोक से हमें यह भी शिक्षा मिलती है कि आत्मा का स्वभाव अचल है और वह सदैव स्थिर रहता है।