स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥31॥
Translation (HI)
अपने क्षत्रिय धर्म को ध्यान में रखते हुए, तुझे इस युद्ध से डिगना नहीं चाहिए। धर्मयुद्ध से श्रेष्ठ अन्य कोई कर्तव्य क्षत्रिय के लिए नहीं है।
Life Lesson (HI)
कर्तव्य से विमुख होना आत्मा के विकास में बाधक है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि वे अपने क्षत्रिय धर्म का ध्यान रखकर इस युद्ध में डिगने के लायक नहीं हैं। धर्मयुद्ध से क्षत्रिय के लिए और कोई श्रेष्ठ कर्तव्य विचारने में नहीं है।
इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि हमें अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए और उन्हें निष्पालन करने से बचना चाहिए। क्योंकि कर्तव्य से विमुख होने से हमारा आत्मविकास रुक जाता है और हम अपने उद्देश्य की प्राप्ति में विघ्न आ सकता है। इसलिए हमें अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए अपने लक्ष्य की दिशा में प्रयास करना चाहिए।