नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥40॥
Translation (HI)
इस प्रयास में न कोई हानि है न दोष। इस धर्म का थोड़ा-सा पालन भी बड़े भय से रक्षा कर सकता है।
Life Lesson (HI)
धर्ममार्ग का एक छोटा प्रयास भी अपार रक्षा प्रदान करता है।
Commentary (HI)
यह श्लोक भगवद गीता के चौबीसवें अध्याय में वर्तमान कर्मयोग के सन्दर्भ में उपस्थित है। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि कर्मयोग का पालन करने से किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं होता है और कोई दोष भी नहीं होता। धर्म के एक छोटे से पालन से भी इस संसार में अपार भय से रक्षा होती है।
इस श्लोक का मुख्य संदेश है कि हमें धर्म के मार्ग पर चलने में किसी भी प्रकार की संकट या हानि का डर नहीं होना चाहिए। चाहे हम छोटे से कार्य में लगे हों या बड़े, धर्म के पालन से हमें सुरक्षित रहने का साहस और विश्वास होना चाहिए। धर्म का पालन हमें भय से मुक्ति दिला सकता है और हमें सही मार्ग पर ले जाता है।
इस श्लोक में स्पष्ट रूप से दिखाया गया है कि धर्म का पालन करने से हमें भलाई ही मिलती है और हमें संसार में अपने को सुरक्षित रखने की शक्ति मिलती है। इसलिए, हमें हमेशा धर्म के मार्ग पर चलते रहना चाहिए और छोटे-छोटे कर्मों में भी धर्म का पालन करना चाहिए।