Bhagavad Gita • Chapter 2 • Verse 42

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Chapter 2 • Verse 42

Sankhya Yoga

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः। वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥42॥
Translation (HI)
हे पार्थ! वेदों की पुष्पित वाणी का वर्णन अविवेकी लोग करते हैं, जो यह कहते हैं कि इसके सिवा कुछ नहीं है।
Life Lesson (HI)
बाह्य आडंबर में फंसना आंतरिक विकास को रोकता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जो लोग वेदों की पुष्पित वाणी का वर्णन करते हैं, वे अविवेकी होते हैं। वे लोग यह मानते हैं कि वेदों में ही सभी ज्ञान और सत्य छिपा है और किसी और ग्रंथ या वाणी का महत्व नहीं है। इस तरह की मान्यता रखने वाले लोग अन्धविश्वास में फंसे रहते हैं और उन्हें असली ज्ञान की प्राप्ति के लिए सही मार्ग पर चलने का सम्मान नहीं होता। इस श्लोक का सार्थक अर्थ है कि हमें आध्यात्मिक ज्ञान को समझने और अपनाने के लिए सिर्फ वेदों के मात्र अध्ययन में ही नहीं विचारने की आवश्यकता है। ज्ञान की खोज में हमें खुद को खोजना चाहिए और अपने अन्तरात्मा के माध्यम से सत्य का अनुभव करना चाहिए। बाह्य आडंबर में फंसने से हमारा आंतरिक विकास रुक जाता है और हम असली सत्य को पहचानने में विफल हो जाते हैं। इसलिए, हमें सही दिशा में अग्रसर होने के लिए अपने अंतरंग ज्ञान का विकास करना चाहिए।