यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्। नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥57॥
Translation (HI)
जो शुभ और अशुभ प्राप्त होने पर न प्रसन्न होता है न घृणा करता है, और सर्वत्र अनासक्त रहता है, उसकी प्रज्ञा स्थिर है।
Life Lesson (HI)
साम्यता में ही स्थिरता का रहस्य छुपा है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ध्यान योग की महत्वपूर्ण सिद्धांतों में से एक का वर्णन कर रहे हैं। यहाँ उन्होंने एक उच्च स्थिति का वर्णन किया है जिसके द्वारा अनिष्ट और इष्ट के प्राप्त होने पर भी व्यक्ति स्थिर रहता है और उसे उसके उत्पन्न होने पर हर्ष या द्वेष नहीं होता। इस प्रकार, जो व्यक्ति सभी परिस्थितियों में समभाव से रहता है और उसके साथी जीवों और वस्तुओं के प्रति अनासक्त रहता है, उसकी प्रज्ञा स्थिर होती है। इसका अर्थ है कि उसका मन स्थिर और शांत रहता है और वह सभी परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम होता है।
इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि समभाव से और अनासक्ति से जीने से हम स्थिरता और संतुलन की प्राप्ति कर सकते हैं। हमें अपने अंतर्मन को विकारों से दूर रखना और हर स्थिति में स्थिर रहने की कला को सीखना चाहिए। इस प्रकार, यह श्लोक हमें समझाता है कि संतुलन और स्थिरता की कला केवल उसे प्राप्त हो सकती है जो अपने आप को समर्पित और अनासक्त रखता है।