Bhagavad Gita • Chapter 2 • Verse 8

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Chapter 2 • Verse 8

Sankhya Yoga

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्। अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्॥8॥
Translation (HI)
मैं ऐसा उपाय नहीं देखता जो मेरे इन्द्रियों को सुखा देने वाले इस शोक को दूर कर सके, भले ही मुझे निष्कंटक समृद्ध राज्य या देवताओं का भी अधिपत्य प्राप्त हो जाए।
Life Lesson (HI)
आंतरिक शोक केवल बाहरी उपलब्धियों से समाप्त नहीं होता।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि वे किसी ऐसे उपाय को नहीं देखते जिससे उनके इन्द्रियों को सुख प्राप्त होने वाला यह शोक दूर हो सके। इसका मतलब है कि मानव जीवन में आने वाले शोक और दुःख का कारण केवल भौतिक सुख-साधनों की कमी नहीं होती है, बल्कि यह अंतरंग भावनाओं और मानसिक स्तर पर संतुष्टि की अभाव से भी हो सकता है। भगवान कृष्ण यहाँ बताते हैं कि वे ऐसे समृद्ध राज्य और देवताओं का अधिपत्य भी प्राप्त कर लें, फिर भी उनका शोक दूर नहीं होगा, क्योंकि उसका समाधान केवल भौतिक सुख-साधनों में नहीं है। यहाँ भगवान कृष्ण अर्जुन को यह सिखा रहे हैं कि सच्ची सुख और संतोष अंतरंग शांति और आत्म-संयम में है। इस श्लोक से हमें यह सीखने को मिलता है कि सच्चा शांति और संतोष केवल बाहरी समृद्धि और सुख से ही नहीं मिलता। हमें अपने आत्मा की उपेक्षा करना नहीं चाहिए और अपने आंतरिक सुख की तलाश में ज्यादा मेहनत करनी चाहिए। इससे हम अपने जीवन म