Bhagavad Gita • Chapter 3 • Verse 1

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Chapter 3 • Verse 1

Karma Yoga

अर्जुन उवाच। ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन। तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥1॥
Translation (HI)
अर्जुन ने कहा: हे जनार्दन! यदि आपकी बुद्धि कर्म से श्रेष्ठ मानी जाती है, तो फिर हे केशव! मुझे इस भयानक कर्म में क्यों लगाते हैं?
Life Lesson (HI)
जब ज्ञान को श्रेष्ठ कहा जाए, तब कर्म में उलझन स्वाभाविक है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण से पूछ रहे हैं कि अगर आपकी बुद्धि कहती है कि कर्म ही उत्तम है, तो फिर भयंकर कर्म में मुझे क्यों लगाते हैं? अर्जुन इस संदेश के माध्यम से यह प्रश्न पूछ रहे हैं कि जब ज्ञान को उच्च माना जाता है, तो कर्म करने में उलझन क्यों होती है। भगवद गीता के इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन में अक्सर हमें उलझन और संदेह होते हैं, लेकिन हमें उनका सामना करना होगा और सही निर्णय लेना होगा। इसके लिए हमें अपनी बुद्धि को स्थिर रखना और अपने कर्मों का सही निर्णय लेना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस श्लोक के माध्यम से हमें यह भी समझने को मिलता है कि अक्सर हमारी बुद्धि हमें सही और गलत के बीच भ्रमित कर सकती है, और इसलिए हमें अपनी बुद्धि को साकार करके सही दिशा में चलना चाहिए। इस श्लोक का सारांश यह है कि ज्ञान और कर्म दोनों का सही संयोजन होना चाहिए ताकि हम सही दिशा में चल सकें और अपने कर्मों के माध्यम से सफलता प्राप्त कर सकें।