न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन। नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥22॥
Translation (HI)
हे पार्थ! तीनों लोकों में मेरा कोई कर्तव्य नहीं है, फिर भी मैं कर्म में रत रहता हूँ।
Life Lesson (HI)
कर्तव्य भावना का आदर्श स्वयं भगवान द्वारा स्थापित है।
Commentary (HI)
श्रीकृष्ण यहां पार्थ से कह रहे हैं कि उनका कोई कर्तव्य तीनों लोकों में नहीं है, यानी उन्हें किसी भी कार्य को करने का कोई बंधन नहीं है। फिर भी, वे कर्म में रत रहते हैं। इसका अर्थ है कि भगवान सबका पालन-पोषण करते हैं, उन्हें कोई आवश्यकता नहीं है किसी कर्म का करने की, फिर भी वे लोगों के लिए एक आदर्श स्थापित करने के लिए कर्म करते हैं। यह सिद्ध करता है कि कर्तव्य भावना का आदर्श स्वयं भगवान द्वारा स्थापित है, इसलिए हर व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का निष्ठा से पालन करना चाहिए।