उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्। सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः॥24॥
Translation (HI)
यदि मैं कर्म न करूँ तो ये लोक नष्ट हो जाएंगे। मैं वर्णसंकर का कर्ता बनूँगा और इस प्रकार प्रजाओं का विनाश करूँगा।
Life Lesson (HI)
कर्तव्य त्याग से केवल स्वविनाश नहीं, समाज विनाश भी होता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि यदि वह कर्म करना छोड़ दे तो समाज में विप्लव हो सकता है। वह समाज के लिए अपने कर्तव्यों का पालन करने में सहायता करता है, अगर वह यह कर्म न करे तो समाज में वर्णसंकर का उत्पन्न होने का खतरा हो सकता है। वर्णसंकर समाज में विषमता और असुरक्षा को लेकर आता है। इसलिए, इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण यह सिखाना चाहते हैं कि हर व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए ताकि समाज में समरसता और उत्थान हो सके।