श्रीभगवानुवाच। लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ। ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्॥3॥
Translation (HI)
श्रीभगवान ने कहा: हे निष्पाप अर्जुन! इस संसार में दो प्रकार की निष्ठा का वर्णन मैंने पहले कहा था—ज्ञानयोग के द्वारा सांख्ययोगियों के लिए और कर्मयोग के द्वारा योगियों के लिए।
Life Lesson (HI)
प्रकृति अनुसार भिन्न मार्ग होते हैं।
Commentary (HI)
श्रीकृष्ण भगवान ने यह श्लोक कहा है कि इस संसार में दो प्रकार की निष्ठा है, जिसे मैंने पहले कह दिया था। एक तो ज्ञानयोग का जिसे सांख्ययोगियों के लिए अर्थात ज्ञानमार्ग कहा गया है और दूसरा है कर्मयोग का जिसे योगीयों के लिए अर्थात कर्ममार्ग कहा गया है।
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि हर व्यक्ति अपने स्वभाव और प्रारब्ध के अनुसार अपने लिए सही मार्ग चुनना चाहिए। कुछ लोग ज्ञान और विचार के माध्यम से आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं, जबकि कुछ लोग कर्म और सेवा के माध्यम से अपने मन को शुद्ध करना चाहते हैं। इसलिए, हमें अपने धर्मिक और मानसिक स्वभाव के अनुसार सही मार्ग चुनना चाहिए और उसमें स्थिर रहकर प्रयास करना चाहिए।