न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते। न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥4॥
Translation (HI)
केवल कर्म का आरंभ न करने से मनुष्य निष्कर्म नहीं हो सकता, और केवल कर्म का त्याग कर सिद्धि प्राप्त नहीं होती।
Life Lesson (HI)
सच्ची सिद्धि कर्म त्याग से नहीं, कर्मयोग से मिलती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि केवल कर्म का त्याग करने या केवल कर्म करने से मनुष्य निष्कर्म योगी नहीं बन सकता। न कर्म का आरंभ करने से ही और न कर्म का त्याग करने से ही सिद्धि प्राप्त होती है।
इसका अर्थ है कि हमें कर्म को त्यागने की बजाय कर्मयोग के माध्यम से कर्म करना चाहिए। यानी, कर्म करते समय हमें उसके फलों की आकांक्षा छोड़नी चाहिए और सेवा भाव से कर्म करना चाहिए। इस तरह से कर्मयोग के माध्यम से हम सच्ची सिद्धि को प्राप्त कर सकते हैं।
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि कर्म को त्यागना नहीं, बल्कि सही दृष्टिकोण से कर्म करना चाहिए। अपने कर्मों का निष्काम भाव रखकर ईश्वर के लिए समर्पित कर्म करना ही सच्ची सिद्धि की राह है।