हर इन्द्रिय का अपने विषय के प्रति राग और द्वेष होता है; मनुष्य को इनके वश में नहीं होना चाहिए, क्योंकि वे उसके पथ के बाधक हैं।
Life Lesson (HI)
राग और द्वेष आत्मोन्नति के सबसे बड़े शत्रु हैं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को इंद्रियों की व्यवस्था करने की महत्वपूर्ण बात सिखा रहे हैं। इंद्रियों का अर्थ है ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय, अर्थात् पाँच ज्ञानेंद्रिय (आंखें, कान, नाक, जीभ, त्वचा) और पाँच कर्मेन्द्रिय (मुंह, हाथ, पैर, उपस्थ, पायु). इन इंद्रियों का हर एक अपने विषय को लेकर राग और द्वेष करता है। यह राग और द्वेष हमें संसार में बंधन में डाल सकते हैं और हमें आत्मिक उन्नति से दूर ले जा सकते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन राग और द्वेषों की वजह से हमें उनके वश में नहीं होना चाहिए। यदि हम इन इंद्रियों के वश में नहीं होते हैं, तो हमारे मार्ग में कोई बाधा नहीं आती। इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि राग और द्वेष हमारे आत्मिक विकास की राह में सबसे बड़ी बाधा हो सकते हैं। इसलिए हमें इनको संयमित रखना और उन्हें नियंत्रित करने की कला सीखनी चाहिए। यदि हम इन राग और द्वेषों को नियंत्रित कर सकते हैं, तो हम आत्म