कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्। इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥6॥
Translation (HI)
जो व्यक्ति बाहरी इन्द्रियों को रोककर मन से इन्द्रियों के विषयों का चिंतन करता है, वह भ्रांतचित्त मिथ्याचार कहलाता है।
Life Lesson (HI)
बाह्य संयम से अधिक महत्वपूर्ण है अंतःकरण की शुद्धता।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से विचार करने की सही दिशा दर्शाते हैं। यहाँ उन्होंने कहा है कि जो व्यक्ति अपने कर्मेंद्रियों को नियंत्रित करके मन से इन्द्रियों के विषयों का ध्यान करता है, वह व्यक्ति भ्रांतिमय चित्त और दुराचारी है।
इस भावार्थ में यह समझाया जा रहा है कि अंतरंग शुद्धि और मन की स्थिरता किसी भी बाह्य क्रिया से अधिक महत्वपूर्ण है। बाह्य इन्द्रियों का नियंत्रण करना महत्वपूर्ण है, लेकिन मन को नियंत्रित रखकर इन्द्रियों का सही उपयोग करना भी जरूरी है। इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि आंतरिक शांति और स्थिरता हमारे व्यवहारिक जीवन में महत्वपूर्ण हैं।