यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन। कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥7॥
Translation (HI)
लेकिन जो व्यक्ति मन द्वारा इन्द्रियों को वश में कर, कर्मेन्द्रियों द्वारा आसक्ति रहित होकर कर्मयोग में प्रवृत्त होता है, वही श्रेष्ठ कहलाता है।
Life Lesson (HI)
आसक्ति रहित कर्म ही योग का सार है।
Commentary (HI)
यहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जो व्यक्ति अपने मन द्वारा इन्द्रियों को वश में करके कर्मयोग में प्रवृत्त होता है, वह व्यक्ति श्रेष्ठ होता है। अर्थात् जब हम अपने मन को नियंत्रित करके इन्द्रियों को वश में रखते हैं और आसक्ति रहित कर्म करते हैं, तो हम योगी बन जाते हैं। इस श्लोक से हमें यह सिखने को मिलता है कि कर्मयोग में सफलता के लिए आसक्ति रहित कर्म करना आवश्यक है। यहाँ योग का अर्थ है एकीभाव से कर्म करना और भगवान की भावना में समर्पित होना। इस प्रकार, यह श्लोक हमें साफ़ रूप से बताता है कि आसक्ति रहित कर्म ही योग का सार है।