नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः। शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥8॥
Translation (HI)
नियत कर्म कर, क्योंकि कर्म न करने से अकर्मण्यता आती है; और तेरी शरीरयात्रा भी बिना कर्म के संभव नहीं है।
Life Lesson (HI)
कर्म मानव जीवन का आधार है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि वह नियत कर्म करे। क्योंकि कर्म करने से उसके लिए अकर्मण्यता यानी कार्यनिष्ठा की प्राप्ति होती है। और उसकी शरीरयात्रा भी कर्मरहित रहना संभव नहीं है।
इस श्लोक का मुख्य संदेश है कि हमें कर्म करना चाहिए और कार्य के प्रति संबंधित होकर उसे पूरा करना चाहिए। कर्म ही हमारे जीवन का आधार है और इसके माध्यम से हम अपनी उन्नति कर सकते हैं। इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि हमें कर्मयोग का पालन करना चाहिए और सामर्थ्य और सामर्थ्य के साथ कर्म करना चाहिए।