मैंने चार वर्णों की रचना गुण और कर्म के अनुसार की है। यद्यपि मैं उसका कर्ता हूँ, फिर भी तू मुझे अकर्त्ता और अविनाशी जान।
Life Lesson (HI)
कर्म और स्वभाव ही वास्तविक योग्यता का निर्धारण करते हैं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह बता रहे हैं कि उन्होंने चार वर्णों की रचना की है, जो गुण और कर्म के अनुसार विभाजित हैं। भगवान कहते हैं कि वे इस संसार के कर्ता होते हुए भी अकर्ता और अविनाशी हैं। इसका तात्पर्य यह है कि जैसा कर्म और गुण हमारी प्राकृतिक धारा में है, वह हमें वास्तविक स्वभाव और कर्म का निर्धारण करता है। इस श्लोक से हमें यह समझने को मिलता है कि हमें अपने कर्मों को समझना और उन्हें सही दृष्टिकोण से देखना चाहिए ताकि हम अपने वास्तविक स्वभाव का पता लगा सकें और उसी के अनुसार अपने कर्मों को निर्धारित कर सकें।