न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा। इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥14॥
Translation (HI)
मुझे कर्म नहीं बांधते और न ही मुझे कर्मफल की इच्छा है। जो मुझे इस प्रकार जानता है, वह कर्मों से नहीं बंधता।
Life Lesson (HI)
कर्म के बंधन से मुक्त होना संभव है यदि भाव शुद्ध हो।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण यह बता रहे हैं कि वे स्वयं कर्मों से बंधित नहीं होते हैं और न ही उन्हें कर्मफल की इच्छा है। जो व्यक्ति इस तत्व को समझ लेता है, वह कर्मों से नहीं बंधता है। इसका अर्थ है कि जब हम कर्म करते हैं और उसके फल की आकांक्षा नहीं रखते हैं, तो हम कर्म के बंधन से मुक्त हो सकते हैं। एक साधक को समझना चाहिए कि कर्म अपने कर्मफल के लिए नहीं किया जाता है, बल्कि उसे निष्काम भाव से करना चाहिए। इस भावना के साथ कर्म करने से हमारा मन शुद्ध और स्थिर रहता है और हम कर्मबंधन से मुक्त हो सकते हैं।