जिसने सभी इच्छाओं और संग्रहों को त्याग दिया है, मन और आत्मा को नियंत्रित कर केवल शरीर निर्वाह हेतु कर्म करता है, वह पाप को प्राप्त नहीं होता।
Life Lesson (HI)
इच्छा और संग्रह से मुक्त कर्म ही पवित्र होता है।
Commentary (HI)
श्लोक 21 में भगवान कृष्ण आस्था की उत्तमता को व्यक्त कर रहे हैं। इस श्लोक में हमें यह सिखाया जा रहा है कि एक व्यक्ति जो इच्छाओं और संग्रहों से निराश और विचारशील होता है, जो सभी परिग्रह (आस्तिका) को त्याग देता है, वह केवल शरीर के लिए कर्म करता है और उसे पाप का भाग्य नहीं होता।
इस भाष्य के माध्यम से हमें यह बात समझनी चाहिए कि जीवन में इच्छाएं हमें बंधन में डाल सकती हैं और संग्रह हमें अधिकारी बना सकता है। इसलिए, एक व्यक्ति को इन बाधाओं से मुक्त होकर केवल शरीर के लिए कर्म करना चाहिए। इस तरह का कर्म पवित्र होता है और व्यक्ति को पाप से दूर रखने में मदद करता है।
इस श्लोक से हमें यह सिखाने का संदेश मिलता है कि हमें इच्छाओं और संग्रहों से मुक्त होकर कर्म करना चाहिए और इस तरह का कर्म हमें पवित्र बनाता है। इससे हमें आत्मा की उच्चता और शुद्धता की दिशा में अग्रसर होने में मदद मिलती है।