जिसका यज्ञ ब्रह्म है, आहुति ब्रह्म है, ब्रह्म अग्नि में ब्रह्म द्वारा हवन किया जाता है— वह ब्रह्म को ही प्राप्त होता है।
Life Lesson (HI)
पूर्णता की प्राप्ति तब होती है जब सब कुछ ब्रह्मरूप माना जाए।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवद गीता में यज्ञ की महत्वपूर्णता पर विचार किया गया है। यहां कहा गया है कि जो कुछ भी हम करते हैं, वह सब ब्रह्मरूप है। अर्थात्, जो कुछ हम यज्ञ के रूप में ईश्वर को समर्पित करते हैं, वह सब ब्रह्म ही है। आहुति भी ब्रह्म है, यजमान भी ब्रह्म है, और यज्ञ की अग्नि में जो अर्पित किया जाता है, वह भी ब्रह्म ही है। इस प्रकार, जो व्यक्ति सब कुछ ब्रह्मरूप मानता है, वह पूर्णता की प्राप्ति के लिए उस स्थिति में पहुंच जाता है जिसे ब्रह्मकर्मसमाधि कहा गया है। इस भावना के साथ जीवन में समर्पण और उदारता के माध्यम से हम अपने कर्मों को ईश्वर के साथ मिलाकर एक ऊंची स्थिति तक पहुंच सकते हैं।