जिसका आसक्ति से संबंध टूट चुका है, जो मुक्त है और जिसका चित्त ज्ञान में स्थित है— उसका सम्पूर्ण कर्म यज्ञ में लीन हो जाता है।
Life Lesson (HI)
ज्ञानयुक्त कर्म, आत्मा को कर्मबंधन से मुक्त करता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण उस व्यक्ति के लिए विशेष शिक्षा दे रहे हैं जो संग से एकांत होकर ज्ञान की अवस्था में स्थिर है। इस व्यक्ति के कर्म यज्ञ में लीन हो जाते हैं, अर्थात् उनके सभी कर्म यज्ञ के रूप में समाहित हो जाते हैं। यहाँ "यज्ञ" का अर्थ अलग-अलग हो सकता है, परंतु इस श्लोक में यज्ञ का अर्थ उपासना, सेवा और समर्पण के साथ कर्म करना है।
इस श्लोक का भावार्थ यह है कि जब हम अपने कर्मों को ज्ञान और उपासना के साथ करते हैं, तो हमारी आत्मा कर्मबंधन से मुक्त हो जाती है और हम आत्मसात् में स्थित हो जाते हैं। इससे हम विश्वास और आसक्ति के बंधनों से मुक्त होकर आत्मा का आनंद और शांति प्राप्त कर सकते हैं। इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि ज्ञान और कर्म का संयोग हमें आत्मिक उन्नति और मुक्ति की दिशा में ले जाता है।