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vishnu, work, duties, bondage

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vishnu, work, duties, bondage

28 verses
Chapter 3 • Verse 9
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यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः। तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर॥9॥
Chapter 3 • Verse 10
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सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥10॥
Chapter 3 • Verse 11
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देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥11॥
Chapter 3 • Verse 12
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इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः। तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥12॥
Chapter 3 • Verse 14
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अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥14॥
Chapter 3 • Verse 15
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कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्। तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥15॥
Chapter 4 • Verse 23
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गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः। यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥23॥
Chapter 4 • Verse 25
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दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते। ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥25॥
Chapter 4 • Verse 26
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श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति। शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥26॥
Chapter 4 • Verse 27
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सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे। आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥27॥
Chapter 4 • Verse 28
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द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे। स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः॥28॥
Chapter 4 • Verse 30
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अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति। सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥30॥
Chapter 4 • Verse 31
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यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। नायं लोकोऽयज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥31॥
Chapter 4 • Verse 32
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एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे। कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥32॥
Chapter 4 • Verse 33
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श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप। सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥33॥
Chapter 8 • Verse 2
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अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस্মिन्मधुसूदन। प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥2॥
Chapter 8 • Verse 4
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अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतं। अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥4॥
Chapter 9 • Verse 15
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ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्॥15॥
Chapter 9 • Verse 16
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अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्। मन्त्रोहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्॥16॥
Chapter 17 • Verse 11
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अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते। यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥11॥
Chapter 17 • Verse 12
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अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्। इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥12॥
Chapter 17 • Verse 13
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विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्। श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥13॥
Chapter 17 • Verse 24
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तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः। प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्॥24॥
Chapter 17 • Verse 25
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तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः। दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥25॥
Chapter 17 • Verse 27
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यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सत् इति चोच्यते। कर्म चैव तदर्थीयं सत् इत्येवाभिधीयते॥27॥
Chapter 18 • Verse 1
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अर्जुन उवाच। संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्। त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन॥1॥
Chapter 18 • Verse 3
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त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः। यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे॥3॥
Chapter 18 • Verse 5
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यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥5॥