Bhagavad Gita • Chapter 4 • Verse 27

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Chapter 4 • Verse 27

Jnana–Karma Sannyasa Yoga

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे। आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥27॥
Translation (HI)
कुछ योगी अपने सभी इन्द्रिय और प्राण कर्मों को आत्म-संयम रूपी ज्ञान की अग्नि में अर्पित करते हैं।
Life Lesson (HI)
ज्ञान और संयम का यज्ञ आत्मा को शुद्ध करता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण भगवद गीता में योग की महत्वपूर्ण बातें बता रहे हैं। यहाँ कहा गया है कि कुछ योगी अपने सभी इन्द्रियों और प्राण कर्मों को आत्म-संयम रूपी ज्ञान की अग्नि में अर्पित करते हैं। इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति अपने इन्द्रियों और मन को नियंत्रित करके आत्मा के साथ मिला जाता है, वह अपने कर्मों को भगवान की भावना में समर्पित करता है। इस भावना को ज्ञान की अग्नि कहा गया है, जिसमें सभी कर्मों का शुद्धीकरण होता है। इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि जब हम ज्ञान और संयम के माध्यम से अपने कर्मों को भगवान की अर्पण करते हैं, तो हमारी आत्मा को शुद्ध किया जा सकता है और हम अध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ सकते हैं। इसके जरिए हम अपने आत्मा को प्रकाशित कर सकते हैं और अपने भगवान के साथ एकता महसूस कर सकते हैं। इसलिए, यह श्लोक हमें ज्ञान और संयम के महत्व को समझाने का संदेश देता है।