Bhagavad Gita • Chapter 17 • Verse 27

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Chapter 17 • Verse 27

Shraddhatraya Vibhaga Yoga

यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सत् इति चोच्यते। कर्म चैव तदर्थीयं सत् इत्येवाभिधीयते॥27॥
Translation (HI)
यज्ञ, तप और दान में निरंतरता को ‘सत्’ कहा गया है और उन कार्यों को भी जो इन उद्देश्यों से किए जाते हैं।
Life Lesson (HI)
सत्कार्य में निरंतरता ही उसे सिद्ध करती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण सत्य या सत्ता का वर्णन कर रहे हैं। यहाँ 'सत्' के रूप में यज्ञ, तपस्या और दान की स्थिति को बताया गया है। यह स्थिति संसारिक क्रियाओं में इस्तेमाल होने वाले कर्मों को भी ध्यान में रखती है। यज्ञ, तप और दान - ये तीनों ही उद्देश्यों से किए जाए तो 'सत्' यानी सत्य के रूप में माने जाते हैं। इसका मतलब है कि जब हम यज्ञ, तप और दान को सत्य के रूप में निरंतरता से और प्रेम से करते हैं, तो हमारा कर्म भी सत्य के रूप में माना जाता है। श्रीकृष्ण यहाँ हमें यह सिखाते हैं कि हमें जीवन में किसी भी कार्य को करते समय उसमें निरंतरता और सत्य को ध्यान में रखना चाहिए। इससे हमारे कर्म का मार्ग स्पष्ट होगा और हम सही दिशा में अग्रसर होंगे। इस भावना के साथ हमारे कर्म भी सत्य की ओर बढ़ते जाएंगे। इसका सार यह है कि हमें अपने कर्मों को सत्य और निरंतरता के साथ करना चाहिए। यह हमें अच्छे कर्मों की दिशा में ले जायेगा और सही मार्ग पर चलने में सहायता करेगा।