सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते। प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥26॥
Translation (HI)
‘सत्’ शब्द का प्रयोग सद्भाव और पुण्यभाव में होता है, हे पार्थ! और वह प्रशंसनीय कर्मों में भी प्रयुक्त होता है।
Life Lesson (HI)
सत् शब्द शुभता, पवित्रता और सच्चाई का प्रतीक है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि 'सत्' शब्द का उपयोग सद्भाव और पुण्यभाव के लिए किया जाता है। यानी जो भावनाएं सच्ची और उचित होती हैं, वह 'सत्' कहलाती है। इसके साथ ही, 'सत्' शब्द का प्रयोग प्रशंसनीय कर्मों में भी किया जाता है। अर्थात् जो कर्म सच्चे और उचित होते हैं, उन्हें भी 'सत्' कहा जाता है।
इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि हमें अपने विचारों और कर्मों में सत्यता, उचितता और पुण्यभाव को अपनाना चाहिए। हमें उचित और नेक कर्मों को करना चाहिए और सच्चाई के मार्ग पर चलना चाहिए। यह हमें एक सजीव और उचित जीवन जीने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है।