कर्म को ब्रह्म से उत्पन्न जानो और ब्रह्म को अविनाशी से उत्पन्न जानो। इसलिए सर्वव्यापी ब्रह्म सदा यज्ञ में प्रतिष्ठित है।
Life Lesson (HI)
सर्वव्यापी ब्रह्म का प्रकटीकरण यज्ञ में होता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवद गीता का महत्वपूर्ण सिद्धांत व्यक्त हो रहा है। यहाँ भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि सभी कर्म भगवान से ही उत्पन्न होते हैं और भगवान अविनाशी हैं। इसलिए, जैसे सभी कर्म भगवान से ही उत्पन्न होते हैं, वैसे ही भगवान सर्वव्यापी हैं और सदा ही यज्ञ के रूप में प्रतिष्ठित रहते हैं।
इस भावार्थ में यह बताया गया है कि सभी कर्म भगवान की उपस्थिति में ही किए जाने चाहिए और उन्हीं के लिए किए जाने चाहिए। यह श्लोक हमें यह शिक्षा देता है कि हर कर्म को भगवान के लिए अर्पित करना चाहिए और हमें यह याद रखना चाहिए कि भगवान सभी कर्मों का परमात्मा हैं और उन्हें ही हमें अपना कर्म समर्पित करना चाहिए।
इस श्लोक से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें सभी कर्मों को भगवान की उपासना के रूप में करना चाहिए और सभी कार्यों को यज्ञ के रूप में स्वीकार करना चाहिए। इससे हमें निःस्वार्थता, ध्यान और उत्कृष्टता की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रे