Bhagavad Gita • Chapter 3 • Verse 14

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Chapter 3 • Verse 14

Karma Yoga

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥14॥
Translation (HI)
भूतों का पालन अन्न से होता है, अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है, वर्षा यज्ञ से उत्पन्न होती है और यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है।
Life Lesson (HI)
कर्तव्यपालन ही सम्पूर्ण सृष्टि के पोषण का आधार है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण भूतों के जीवन का संचालन और पोषण कैसे होता है, उसकी व्याख्या कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि भूतों का पोषण अन्न से होता है। अन्न जो है, वह वर्षा से उत्पन्न होता है। वर्षा यज्ञ से उत्पन्न होती है और यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है। इस श्लोक का महत्वपूर्ण सन्देश है कि हमें अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, क्योंकि यही हमारे जीवन और समृद्धि का मूल है। हमें यज्ञ और कर्म के माध्यम से समाज की सेवा और सहायता करनी चाहिए, जिससे समृद्धि और समर्थन का प्रवाह हमें प्राप्त हो सके। इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण ने इस श्लोक के माध्यम से हमें समाज की सेवा और सामर्थ्य में सहायता करने की महत्वपूर्णता को समझाया है।