यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः। भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥13॥
Translation (HI)
यज्ञशिष्ट भोजन करने वाले पुण्यात्मा सब पापों से मुक्त हो जाते हैं, परंतु जो स्वार्थवश भोजन पकाते हैं वे पाप खाते हैं।
Life Lesson (HI)
स्वार्थ का त्याग और सेवा का भाव पापों से मुक्ति दिलाता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण भगवद गीता में यज्ञशिष्ट (यज्ञ से बचा हुआ भोजन) के महत्व को बताते हैं। उन्होंने बताया है कि जो व्यक्ति यज्ञशिष्ट का भोजन करता है, वह पुण्यात्मा होता है और सभी पापों से मुक्त हो जाता है। लेकिन जो व्यक्ति स्वार्थ के लिए भोजन पकाता है, वह पापों को भोगता है।
यहाँ प्रमुख संदेश है कि स्वार्थ का त्याग और सेवा का भाव जीवन में लाने से हम पापों से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। यज्ञशिष्ट का भोजन करना एक प्रकार की सेवा है और इससे हम समर्पण का भाव विकसित कर सकते हैं। इस श्लोक से हमें स्वार्थ और सेवा के महत्व को समझाने का संदेश मिलता है।