एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः। अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥16॥
Translation (HI)
जो इस यज्ञचक्र का पालन नहीं करता वह पापी है, इन्द्रियों में ही रमण करता है और उसका जीवन व्यर्थ है।
Life Lesson (HI)
निस्वार्थ यज्ञचक्र का पालन ही सच्चा जीवन है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जो व्यक्ति इस यज्ञचक्र का पालन नहीं करता, उसे पापी माना जाता है। वह अपनी इंद्रियों में ही रमण करता है और उसका जीवन व्यर्थ होता है।
इस भावार्थ में 'यज्ञचक्र' का अर्थ है निस्वार्थ कर्म का पालन करना। यज्ञ का अर्थ है कर्म और चक्र का अर्थ है सतत प्रवृत्ति। जिस व्यक्ति निस्वार्थ कर्म करता है, उसे जीवन में संतुलितता और सफलता मिलती है। ऐसे व्यक्ति का जीवन सच्चाई और उद्देश्य की दिशा में होता है।
यह श्लोक हमें सिखाता है कि निस्वार्थ भाव से कर्म करना हमारे जीवन को मानवीयता, सहानुभूति और संतुलन में लेकर जाता है। इससे हमारे जीवन में सफलता और सुख की प्राप्ति होती है। इसलिए, हमें निस्वार्थ यज्ञचक्र का पालन करना चाहिए ताकि हमारा जीवन संतुलित और सफल हो सके।