यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः। आत्मन्येव च सन्तुष्टः तस्य कार्यं न विद्यते॥17॥
Translation (HI)
जो मनुष्य आत्मा में ही रत, आत्मा में ही तृप्त और आत्मा में ही संतुष्ट है, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है।
Life Lesson (HI)
स्वयं में संतुष्टि ही सच्ची स्वतंत्रता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि जो व्यक्ति आत्मरत (आत्मा में लगा रहने वाला), आत्मतृप्त (आत्मा में संतुष्ट) और आत्मसंतुष्ट (आत्मा में पूर्ण संतुष्ट) है, उसके लिए कुछ कर्तव्य नहीं है। इसका मतलब है कि जो व्यक्ति अपने आत्मा में ही खोया रहता है, उसे भलीभाँति परिपूर्ण और संतुष्ट महसूस होता है और उसके लिए कोई अन्य कर्तव्य नहीं रहता।
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि सच्ची स्वतंत्रता और खुशियाँ आत्मा के साथ सुरक्षित और संबंधित होती हैं। यदि हम अपने आत्मा में संतुष्ट हैं, तो हमारे लिए कोई अन्य कर्तव्य या आवश्यकता नहीं है क्योंकि हमारी आत्मा ही हमें पूर्णता और संतोष का अनुभव कराती है। इस श्लोक से हमें यह शिक्षा मिलती है कि असली सुख और संतुष्टि अपने आत्मा में ही मिलती है और इसी में हमारी सच्ची स्वतंत्रता और खुशियाँ छिपी होती हैं।