Bhagavad Gita • Chapter 18 • Verse 3

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Chapter 18 • Verse 3

Moksha Sannyasa Yoga

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः। यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे॥3॥
Translation (HI)
कुछ मनीषी कहते हैं कि सभी कर्म दोषयुक्त हैं, अतः त्याज्य हैं। परन्तु अन्य ज्ञानी कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप जैसे कर्मों को नहीं त्यागना चाहिए।
Life Lesson (HI)
कर्म के प्रति दृष्टिकोण ही त्याग या संन्यास का आधार होता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवद गीता में कर्म और त्याग के महत्व का मुख्य विषय है। यहां दो तरह के विचारकों की बात की गई है। पहले विचारक समझाते हैं कि सभी कर्म दोषयुक्त होते हैं और इसलिए उन्हें त्याग देना चाहिए। उनका मानना है कि कर्म से बंधन बनता है और इसलिए उसे छोड़ देना चाहिए। दूसरे विचारक यह कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप जैसे कर्मों को छोड़ना नहीं चाहिए। इन कर्मों का महत्व अपने स्वार्थ के लिए नहीं होता, बल्कि समर्पण और सेवा के लिए होता है। इन कर्मों के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन को सार्थक और उद्देश्यपूर्ण बनाता है। इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि कर्म करना महत्वपूर्ण है, परन्तु उसे सही भावना और दृष्टिकोण से करना चाहिए। जब हम अपने कर्मों को समर्पित भाव से करते हैं, तो उससे हमें सच्ची उत्तमता और आनंद मिलता है। इसलिए, हमें अपने कर्मों के प्रति सही दृष्टिकोण और भावना बनाए रखना चाहिए।