निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम। त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः॥4॥
Translation (HI)
हे भरतश्रेष्ठ! अब त्याग के विषय में मेरा निश्चित मत सुनो, हे पुरुषसिंह! त्याग तीन प्रकार का बताया गया है।
Life Lesson (HI)
सच्चा त्याग विवेक से होता है, और उसके प्रकार भी होते हैं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि वे त्याग के विषय में अब अपना स्थिर निश्चय करें। उन्होंने कहा कि त्याग तीन प्रकार का होता है और उन्होंने इन तीन प्रकारों का वर्णन किया है।
सच्चा त्याग विवेक से होता है, यानी त्याग करने से पहले विचार करना चाहिए कि क्या सही है और क्या गलत। त्याग का महत्व भी इस श्लोक में बताया गया है कि यह पुरुषों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। त्याग का अर्थ है किसी चीज को छोड़ना या अर्पण कर देना। भगवान श्रीकृष्ण को अर्जुन से इस त्याग के महत्व को समझाने का प्रयास कर रहे हैं।
इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि हमें अपने जीवन में सच्चे और विवेकपूर्ण त्याग का अभ्यास करना चाहिए, जिससे हमारा जीवन सही दिशा में चल सके और हम स्वयं को समृद्ध और संतुष्ट महसूस कर सकें।