हे देहधारियों में श्रेष्ठ! समस्त नाशवान प्रकृति अधिभूत है, पुरुष अधिदैव है और मैं स्वयं अधियज्ञ हूँ जो इस शरीर में विद्यमान हूँ।
Life Lesson (HI)
ईश्वर शरीर में भी उपस्थित हैं — यज्ञ रूप में।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अपने भक्त अर्जुन को बता रहे हैं कि इस सृष्टि में अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ के रूप में तीन प्रकार के तत्व हैं। अधिभूत तत्व के रूप में प्रकृति या माया को जाना जाता है, जो इस सृष्टि का नाश करने वाली है। अधिदैव तत्व में पुरुष या ईश्वर का उपासनीय स्वरूप है। और अधियज्ञ तत्व में भगवान कृष्ण स्वयं कहते हैं कि वे इस शरीर में सब यज्ञों का स्वरूप हैं। इसका अर्थ है कि भगवान सम्पूर्ण सृष्टि के संचालन और संरक्षण के लिए यज्ञ के रूप में उपस्थित हैं।
इस श्लोक का मुख्य सन्देश है कि ईश्वर हमारे अंदर भी मौजूद हैं और हमें समझना चाहिए कि हमारे सभी कर्म और भावनाएँ उन्हीं के लिए हैं। हमें समझना चाहिए कि हमारे जीवन का उद्देश्य ईश्वर की उपासना और उसके लिए सेवा करना है। इसके माध्यम से हम ईश्वर के साथ एक निकट संबंध स्थापित कर सकते हैं और अपने जीवन को उच्च उद्देश्य की दिशा में ले जा सकते हैं।