अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस্মिन्मधुसूदन। प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥2॥
Translation (HI)
हे मधुसूदन! यह अधियज्ञ कौन है और इस शरीर में कैसे है? और मृत्यु के समय संयमित आत्मा वाले आपको कैसे जान सकते हैं?
Life Lesson (HI)
मृत्यु के समय की चेतना परम लक्ष्य की प्राप्ति तय करती है।
Commentary (HI)
यह श्लोक भगवद गीता के द्वितीय अध्याय का एक प्रमुख श्लोक है। अर्जुन यहाँ भगवान कृष्ण से पूछ रहे हैं कि मृत्यु के समय कौन अधियज्ञ है और वह कैसे इस शरीर में हैं? और मृत्यु के समय संयमित आत्मा वाले व्यक्ति कैसे उसे जान सकते हैं?
इस श्लोक के माध्यम से हमें यह शिक्षा मिलती है कि मृत्यु के समय परम लक्ष्य की प्राप्ति करने वाले व्यक्ति को अपनी आत्मा को संयमित रखने की आवश्यकता है। यह उसे अपने आत्मा की स्थिति को समझने और अंतिम समय में उसे परम लक्ष्य की प्राप्ति में मदद करता है।
इस श्लोक का महत्वपूर्ण संदेश है कि हमें अपने आत्मा को संयमित रखना चाहिए और उसे परम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तैयार रहना चाहिए। इससे हमें अपने जीवन के उद्देश्य को समझने में मदद मिलेगी और हम अपने आत्मा की स्थिति को समझकर उसे उन्नति की दिशा में ले जा सकेंगे।