अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते। यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥11॥
Translation (HI)
जो यज्ञ शास्त्र के अनुसार और फल की इच्छा रहित होकर केवल कर्तव्य समझकर किया जाता है — वह सात्त्विक यज्ञ है।
Life Lesson (HI)
कर्तव्य भावना से किया गया कार्य ही शुद्ध यज्ञ है।
Commentary (HI)
यह श्लोक भगवद गीता के अध्याय 17, श्लोक 11 से लिया गया है। इस श्लोक में भगवान् कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो यज्ञ केवल शास्त्रों के अनुसार, फल की इच्छा रहित और कर्तव्य के भाव से किया जाता है, वह सात्त्विक यज्ञ है। इस यज्ञ में यज्ञ करने वाला अपने मन को केवल कर्तव्य की दिशा में लगाता है और फल की आकांक्षा से परे रहता है। इस यज्ञ को करने से व्यक्ति कर्मबंधन से मुक्त होकर अपने कर्तव्यों को निष्ठा से पालन करता है।
इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि हमें अपने कर्तव्यों का पालन करते समय फल की आकांक्षा से परे रहना चाहिए। हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारा कर्तव्य है करना, परिणामों का नहीं। इस तरह के सात्त्विक यज्ञ से हम अपने मन को शुद्ध करते हैं और अपने कर्मों को भगवान् की भावना के साथ समर्पित करते हैं। इस प्रकार, यह यज्ञ हमें आत्मसमर्पण और ईश्वर के प्रति भक्ति में स्थिर करता है।