यज्ञ के अवशेष अमृत को भोगने वाले लोग सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। हे कुरुश्रेष्ठ! अयज्ञी का न तो यह लोक है और न ही परलोक।
Life Lesson (HI)
यज्ञ जीवन का आधार है; इसके बिना कुछ भी शेष नहीं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट कर रहे हैं कि यज्ञ के अवशेष अमृत को भोगने वाले लोग सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यहाँ 'यज्ञ' का अर्थ न केवल हवन या पूजा है, बल्कि यहाँ यज्ञ का अर्थ है समर्पण और सेवा। यज्ञ के द्वारा हम समाज में अपनी भूमिका निर्धारित करते हैं और उसके माध्यम से समर्पण और सेवा करते हैं।
इस श्लोक में कहा गया है कि यज्ञ के अवशेष अमृत को भोगने वाले लोग सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं, जिससे साफ है कि यज्ञ के द्वारा हम अनन्तता और दिव्यता की ओर प्रगट होते हैं। अयज्ञी लोगों को यह समझने के लिए प्रेरित करता है कि यज्ञ के माध्यम से अपने कर्तव्यों का पालन करें और समर्पण से जीवन जिएं।
इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि यज्ञ जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है और हमें समर्पण और सेवा के माध्यम से अपने आत्मा को पूर्णता की ओर ले जाना चाहिए। यज्ञ के माध्यम से हम अपने आत्मा को उन्नति और मोक्ष की ओर ले जा सकते हैं।