यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव। येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥35॥
Translation (HI)
हे पाण्डव! उस ज्ञान को जानकर तुम फिर से इस प्रकार मोह को प्राप्त नहीं करोगे और समस्त प्राणियों को अपने और मुझमें देखोगे।
Life Lesson (HI)
ज्ञान से अहं और भेद मिटते हैं, और एकता का अनुभव होता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि एक व्यक्ति जब भगवद्गीता के ज्ञान को प्राप्त कर लेता है, तो उसे फिर से मोह में फंसने का भय नहीं रहता। उसे सभी प्राणियों को अपने और भगवान में एकता का अनुभव होता है। ज्ञान से अहंकार और भेदभाव का नाश होता है और व्यक्ति आत्मा में सभी प्राणियों को देखने की क्षमता प्राप्त करता है। इस ज्ञान के साथ एकता और सहयोग का अनुभव होता है जो हमें आत्मा की अद्वितीयता और समर्पण की महत्वपूर्णता का अनुभव कराता है।