योगी लोग शरीर, मन, बुद्धि और केवल इन्द्रियों द्वारा कर्म करते हैं, पर आसक्ति का त्याग कर आत्मशुद्धि के लिए।
Life Lesson (HI)
कर्म का उद्देश्य आत्मा की शुद्धि होनी चाहिए।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण योगियों को कह रहे हैं कि वे शरीर, मन, बुद्धि और केवल इन्द्रियों के माध्यम से कर्म करते हैं, लेकिन उन्हें आसक्ति से त्याग करना चाहिए। इससे उनकी आत्मशुद्धि होती है और वे कर्मों का फल नहीं चाहते। उनका मुख्य ध्यान आत्मा की शुद्धि पर होता है।
यह श्लोक हमें यह शिक्षा देता है कि हमें कर्म करना चाहिए लेकिन उसके फल को भोगने की आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। हमें अपने कर्मों को निःस्वार्थ भाव से करना चाहिए और उनका फल भगवान के लिए समर्पित करना चाहिए। इससे हमारी आत्मा की शुद्धि होती है और हम आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
इस श्लोक में योगियों को आत्मशुद्धि के लिए कर्म करने की महत्वपूर्णता बताई गई है और इससे हमें यह सीख मिलती है कि हमें समर्पण और निःस्वार्थ भाव से कर्म करना चाहिए।