ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते। आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥22॥
Translation (HI)
जो भोग इन्द्रिय और विषयों के संस्पर्श से उत्पन्न होते हैं, वे केवल दुःख का कारण हैं, क्योंकि उनका आरंभ और अंत होता है — बुद्धिमान उनमें सुख नहीं खोजता।
Life Lesson (HI)
इन्द्रिय सुख क्षणिक होते हैं और अंततः दुःख देते हैं।
Commentary (HI)
यहाँ भगवान कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि इन्द्रियों के संस्पर्श से उत्पन्न होने वाले भोग केवल दुःख का कारण होते हैं। इन सुख-दुःख के भोगों का आरंभ और अंत होता है, लेकिन बुद्धिमान व्यक्ति इनमें सही सुख की खोज नहीं करता। इंद्रिय सुख अत्यंत क्षणिक होते हैं और अंत में दुःख देते हैं। इस श्लोक के माध्यम से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि अध्यात्मिक सुख केवल इन्द्रिय सुख से अधिक और स्थायी होता है। इसका संदेश है कि हमें इन्द्रिय सुखों की अनित्यता और दुःख के पीछे छुपे सत्य को समझना चाहिए और अध्यात्मिक सुख की खोज में लगना चाहिए।