शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्। कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥23॥
Translation (HI)
जो मनुष्य शरीर के त्याग से पहले ही काम और क्रोध के वेग को सहन करने में सक्षम होता है — वह योगी और सुखी होता है।
Life Lesson (HI)
सच्चा सुख संयम में है, न कि वासना में।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो व्यक्ति इस संसार से मुक्ति प्राप्त करने के लिए शरीर का त्याग करने के पहले ही काम और क्रोध के वेग को सहन करने में सक्षम हो जाता है, वह योगी और सुखी होता है। यहाँ 'काम' और 'क्रोध' की बात करते हुए यह दिखाया जा रहा है कि जो व्यक्ति अपने मन को वश में रखकर इन भावनाओं को नियंत्रित कर लेता है, वह आत्मसंयमी होता है और अधिक सुखी जीवन जीता है।
इस श्लोक का जीवन संदेश है कि असली सुख संयम में है, न कि अपनी इच्छाओं और वासनाओं की पूर्ति में। यहाँ बताया गया है कि जो व्यक्ति अपने मन को नियंत्रित करके शरीर के बाह्य विषयों के मोह से परे रहता है, वह सच्चे सुख को प्राप्त करता है। इसलिए, यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि अपने मन को नियंत्रित रखना और अपनी इच्छाओं पर विजय प्राप्त करना हमें अधिक सुखी और योग्य बनाता है।