यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः। विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥28॥
Translation (HI)
जिस मुनि ने इन्द्रियों, मन और बुद्धि को वश में किया है, जो मोक्ष को ही अपना ध्येय मानता है, और जिसकी इच्छा, भय व क्रोध समाप्त हो गए हैं — वह सदा मुक्त है।
Life Lesson (HI)
जिसे कुछ भी चाहिए नहीं, वही पूर्ण है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण एक मुनि या संन्यासी के गुणों का वर्णन कर रहे हैं। एक व्यक्ति जो इन्द्रियों, मन और बुद्धि को वश में कर लिया है, जो मोक्ष को ही अपना उद्देश्य मानता है और जिसकी इच्छाएं, भय और क्रोध समाप्त हो गए हैं, वह सदा मुक्त है। इस श्लोक में सतत् स्वधर्म का पालन करने के महत्व का उल्लेख है।
इस श्लोक का मुख्य सन्देश है कि एक साधक को इन्द्रियों को वश में करके उनका संयम रखना चाहिए, और भगवान की आराधना और मोक्ष के प्राप्ति को ही उसका उद्देश्य होना चाहिए। इसके जरिए वह सदा मुक्त और धन्य रहेगा।
इस श्लोक के माध्यम से हमें यह सिखाया जाता है कि वास्तविक स्वतंत्रता उस व्यक्ति को ही प्राप्त होती है जो इन्द्रियों का संयम रखकर अपने मन, बुद्धि और आत्मा को नियंत्रित करता है। इस तरह का आत्म-निग्रह करने वाला व्यक्ति हमेशा ही स्वतंत्र और मुक्त रहता है।
इस श्लोक के साथ भगवान कृष्ण हमें एक उचित और संतुलित जीवन जीने की महत्वपूर्ण सीख देते हैं।