हे महाबाहो! योग रहित संन्यास दु:ख का कारण बनता है; परंतु योगयुक्त मुनि शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त करता है।
Life Lesson (HI)
त्याग यदि समर्पण के बिना हो तो वह पीड़ा देता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि योग रहित संन्यास दु:ख का कारण बनता है। यहाँ 'संन्यास' का अर्थ है त्याग और समर्पण। अगर कोई व्यक्ति त्याग के बिना ही किसी कार्य को करने का निश्चय करता है, तो उसके लिए वह कार्य पीड़ा और दु:ख का कारण बन जाता है।
विराट श्रीकृष्ण कहते हैं कि योगयुक्त मुनि, यानी जो ध्यान और भक्ति से युक्त है, वह शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त करता है। अर्थात, जो व्यक्ति अपने मन को नियंत्रित करके भगवान में लगा रहता है, वह शीघ्र ही अनंतता को प्राप्त करता है और सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा की अनुभूति करता है।
इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि जीवन में त्याग और समर्पण का महत्व है। यदि हम किसी कार्य को इच्छाओं और स्वार्थ के साथ नहीं करते, बल्कि उसे भगवान के लिए समर्पित भाव से करते हैं, तो हमें दु:ख का अनुभव नहीं होता और हम अपने उद्देश्य को भलीभाँति प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए, यह श्लोक हमें योग्य और स