योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते॥7॥
Translation (HI)
योगयुक्त, शुद्ध आत्मा वाला, जिसने आत्मा और इन्द्रियों को जीत लिया है, सभी प्राणियों में आत्मा को देखने वाला — वह कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता।
Life Lesson (HI)
सच्चा योगी कर्म करता है, पर कर्म से बंधता नहीं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण भक्ति योग के माध्यम से जीवन की महत्वपूर्ण उपायों के बारे में बता रहे हैं। एक साधक जो योगयुक्त है, अर्थात जो अपने मन, इंद्रियों और बुद्धि को शांति से नियंत्रित किया हुआ है, वह विशुद्ध आत्मा के साथ जुड़ा हुआ है। उसने अपने इंद्रियों को जीत लिया है, जिससे वह अपने मन को स्वयं पर काबू पाने में सफल होता है।
इस श्लोक में कहा गया है कि एक योगी सम्पूर्ण प्राणियों में आत्मा को देखता है, अर्थात उसके भीतर सभी प्राणियों के आत्मा का सम्मान करता है। इसका मतलब यह है कि वह सभी में होने वाली एकता को समझता है और उनकी सहानुभूति करता है।
इस श्लोक का मुख्य संदेश है कि योगी जो कर्म करता है, वह किसी प्रकार से भी कर्म से बंधित नहीं होता। वह स्वतंत्रता और निष्पक्षता के साथ कर्म करता है, जिससे उसका मन और बुद्धि पवित्र और उज्ज्वल रहता है। इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि सच्चा योगी कर्म करते समय उत्साह, समर्पण और समर्थन के स