युञ्जन्नेवं सदा आत्मानं योगी नियतमानसः। शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥15॥
Translation (HI)
इस प्रकार निरंतर अपने मन को संयमित करते हुए योगी परम शांति को प्राप्त करता है — जो मोक्ष है और जो मेरी स्थिति है।
Life Lesson (HI)
योग आत्मा को परमात्मा में स्थिर कर देता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण योगी के गुणों और साधनाओं के बारे में बता रहे हैं। यहाँ 'युञ्जन्नेवं सदा आत्मानं' कहने का अर्थ है कि योगी निरंतर अपने मन को नियंत्रित रखते हुए, सदैव अपने आत्मा को परमात्मा में संयोजित करता रहता है। इस प्रकार कर्मयोग के माध्यम से उसका मन और आत्मा एक साथ स्थिर रहते हैं।
इस प्रकार करने से वह 'शान्तिं निर्वाणपरमां' प्राप्त करता है, जिसे 'मत्संस्थामधिगच्छति' कहा गया है। यहाँ 'शान्ति' का अर्थ है आत्मा की पूर्ण स्थिति जो मोक्ष कहलाता है, और 'मत्संस्था' का अर्थ है परमात्मा के साथ स्थिति। इस श्लोक के माध्यम से हमें यह शिक्षा मिलती है कि योग के द्वारा आत्मा को परमात्मा में स्थिर करने से हम शांति और मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं।