Bhagavad Gita • Chapter 6 • Verse 14

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Chapter 6 • Verse 14

Dhyana Yoga

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः। मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥14॥
Translation (HI)
शांतचित्त, निर्भय, ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला, मन को वश में करके, मुझमें मन लगाकर और मुझे ही परम मानकर ध्यान करे।
Life Lesson (HI)
ईश्वर में स्थिर चित्त ही सच्चा योग है।
Commentary (HI)
यह श्लोक भगवद गीता के चौदहवें अध्याय का एक अहम् श्लोक है। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने शिष्य अर्जुन को योग की महत्वपूर्ण गुणों के बारे में बता रहे हैं। इस श्लोक में भगवान कह रहे हैं कि जो व्यक्ति शांत चित्त, निर्भय, ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला है, और अपने मन को नियंत्रित करके, मुझमें मन लगाकर और मुझे ही परम मानकर ध्यान करता है, वह योग में स्थित है। इस श्लोक का महत्वपूर्ण संदेश है कि ईश्वर में स्थिर चित्त रखना और उसकी दिशा में अपनी संपूर्ण भक्ति और ध्यान लगाना ही सच्चा योग है। इसके माध्यम से हम स्वयं को परमात्मा के साथ मिलाने का मार्ग ढूंढ सकते हैं और अंततः आत्मा की मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। इस श्लोक के माध्यम से हमें यह समझने को मिलता है कि योग वास्तव में एक मानसिक संदर्भ है, जिसमें चित्त की नियंत्रण और शुद्धि के माध्यम से हम अपने आत्मा के साथ मिल सकते हैं। इसलिए, इस श्लोक के माध्यम से हमें आत्मा की खोज और ईश्वर