सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः। सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥31॥
Translation (HI)
जो योगी मुझे एकत्व में स्थित होकर सभी प्राणियों में स्थित जानता है, वह चाहे जैसे भी कार्य करता हो, वह सदा मुझमें ही स्थित रहता है।
Life Lesson (HI)
एकता की दृष्टि रखने वाला ही सच्चा भक्त है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण विविध प्रकार के भक्तों के बारे में बता रहे हैं। यहाँ उन्होंने कहा है कि जो योगी एकत्व में स्थित होकर सभी प्राणियों में मुझे ही भाजता है, वह सदा मुझमें ही स्थित रहता है, चाहे वह किसी भी कार्य को कर रहा हो। इसका अर्थ है कि जिस भक्त ने सभी प्राणियों में भगवान की प्रतिष्ठा देखी है, उसकी दृष्टि में सभी में भगवान का ही साक्षात्कार होता है। ऐसे योगी में भगवान ही विराजमान होते हैं, और वह जीवन के हर क्षण में भगवान की आराधना करता रहता है।
इस श्लोक का संदेश है कि हमें सभी प्राणियों में भगवान की पहचान करनी चाहिए और सभी में भगवान का ही दर्शन करना चाहिए। एकता और सामर्थ्य के साथ भगवान की भक्ति करने वाला ही वास्तविक भक्त है। इस भावना के साथ ही हमें अपने जीवन में सदैव ईश्वर की उपासना करनी चाहिए ताकि हम सदा उसके साथ जुड़े रहें और सभी प्राणियों में भगवान का साक्षात्कार करें।