आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥32॥
Translation (HI)
जो अर्जुन! आत्मा के समान सभी जगह समभाव से देखता है — चाहे सुख हो या दुःख — वह श्रेष्ठ योगी है।
Life Lesson (HI)
दूसरों में स्वयं को देखना — यही करुणा और योग है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जो योगी आत्मा के समान सभी जगह समभाव से देखता है, उसे सुख और दुःख में समान भाव रखना चाहिए। ऐसा व्यक्ति ही वास्तव में श्रेष्ठ योगी है।
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि हमें दूसरों के साथ करुणा और समभाव से बर्ताव करना चाहिए। हमें अपने आत्मा में दूसरों को देखना चाहिए और उनके साथ उसी भावना से व्यवहार करना चाहिए जैसे हम खुद के साथ करते हैं। इससे हमारा मानवता में समर्पण और सामंजस्य बढ़ता है और हम एक सच्चे योगी की तरह जीवन जीने की क्षमता प्राप्त करते हैं।