यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते। सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥4॥
Translation (HI)
जब व्यक्ति इन्द्रिय विषयों और कर्मों में आसक्त नहीं होता, और सभी संकल्पों को त्याग देता है — तभी वह योगारूढ़ कहलाता है।
Life Lesson (HI)
योग तब प्राप्त होता है जब व्यक्ति विषयों से ऊपर उठता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण योग के महत्वपूर्ण सिद्धांतों में से एक को स्पष्ट कर रहे हैं। यहाँ उन्होंने बताया है कि योगारूढ़ वही होता है जो इन्द्रियों के विषयों और कर्मों में आसक्त नहीं होता है, और सभी संकल्पों को त्याग देता है। इसका अर्थ है कि योग में सिद्धि प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को इन्द्रिय विषयों से ऊपर उठना चाहिए और मन को नियंत्रित करना चाहिए। यह श्लोक हमें योग की महत्वपूर्ण शर्तों के बारे में सूचित करता है जो हमें अपने जीवन में साधना चाहिए। योग के माध्यम से हम अपने मन, इन्द्रियों और कर्मों को नियंत्रित कर सकते हैं और आत्मा के साथ एकात्मता प्राप्त कर सकते हैं। इस श्लोक से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि योग का अर्थ वास्तविक जीवन में उन्नति और सफलता की प्राप्ति है, जो केवल इंद्रियों के विषयों में नहीं बल्कि ऊँचाइयों की ओर पहुँचने के लिए भी होनी चाहिए।