Bhagavad Gita • Chapter 6 • Verse 5

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Chapter 6 • Verse 5

Dhyana Yoga

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥5॥
Translation (HI)
व्यक्ति को अपने द्वारा ही अपने को उठाना चाहिए; वह स्वयं को नीचे नहीं गिराए। क्योंकि व्यक्ति स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही शत्रु।
Life Lesson (HI)
मनुष्य स्वयं का उद्धारक भी है और पतन का कारण भी।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से यह सिखाते हैं कि व्यक्ति को अपने द्वारा ही अपने को उठाना चाहिए। यदि हम खुद को नीचे गिराएंगे तो हमारा कोई और नहीं, बल्कि हमारी ही जिम्मेदारी होती है। मनुष्य को अपने आत्मा के साथ साक्षात्कार करना चाहिए, क्योंकि आत्मा ही उसका सच्चा मित्र है और उसका ही शत्रु। इस श्लोक से हमें यह समझने को मिलता है कि हमारा जीवन हमारे वश में है, हमें अपने आप को संभालना चाहिए और स्वयं को सहायक बनाकर उद्धार करना चाहिए। यह श्लोक मनुष्य को अपनी आत्मा के महत्व को समझने और स्वयं की सामर्थ्य को पहचानने की ओर प्रेरित करता है।