यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति। तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥21॥
Translation (HI)
जो भी भक्त जिस देवता को श्रद्धा से पूजना चाहता है, मैं उसकी श्रद्धा उसी देवता में अचल कर देता हूँ।
Life Lesson (HI)
ईश्वर सभी श्रद्धा को स्वीकार कर उसे पुष्ट करते हैं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण यह बता रहे हैं कि जो भी भक्त जिस देवता को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस भक्त की श्रद्धा को भगवान स्वीकार कर उस देवता में उसकी श्रद्धा को स्थापित करते हैं। यह श्लोक प्रकट करता है कि ईश्वर हर प्राणी की श्रद्धा को स्वीकार करते हैं और उन्हें उनके द्वारा चुने गए पथ पर आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करते हैं। इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि हमें अपनी श्रद्धा को ईश्वर में स्थापित करना चाहिए और उसे सच्चाई और प्रेम के साथ निभाना चाहिए। भगवान हमारी श्रद्धा को स्वीकार करते हैं और हमें उसी मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।